अधिवासित कमरे

-by Sachin Tripathi

एक मकान बनाया है मैंने
नुक्ते, हर्फ़, लफ्ज़ की ईंटों से
बातों की दीवारें सजा
हर ख़्वाब को कमरा दिया।

अलग-अलग दिशा में खुलते
दरवाज़े इन कमरों के,
अलग-अलग धूप हैं पाते
रौशनदान इन कमरों के,
मखमल, माटी, महोगनी
फर्श हैं इन कमरों के।
और अलग है कुछ तो
वो है इनकी दीवारें,
यानी उनकी ईंटें,
यानी कि मेरी बातें।

कई संकल्प में तपीं,
कई जुनून कि आंच लगीं,
तो कुछ हैं विरासत की
मजबूरी, जिम्मेदारी की भेंटें
और बकाया झूठ समझ लो
वो अधपक्की कच्ची ईंटें।

जिनमें नहीं है जोर
मेरे ख़्वाब उठाने का,
जिनका नहीं इरादा है
रुकने, टिक जाने का,
जिनकी भीत भय भरा
शोधन का, उलाहने का।
ज्यों-त्यों मरम्मत कर
इनको और बिठाया है
तो कुछ ने आश्रय
ढह जाने ही में पाया है।

दुरुस्त किए कमरों में
ख़्वाब है कि कोई आए।
उनकी दीवार से लगाकर
अपना एक कमरा उठाए
और कच्ची ईंटों के बदले
खिड़की एक बनाई जाए।

ताकि उस कमरे की धूप
इस कमरे तक आने पाए
और इस कमरे की श्वास
उस कमरे तक जा पाए।
दुरुस्त किए इन कमरों में
ख़्वाब है कि कोई आए।

Sachin Tripathi is a long time member at Poetry Club who has guided batches of juniors with valuable insights on Hindi poetry and writing. As he spends his last few days as a college student, we wish him luck, prosperity and success for the future and duly thank him for his work at Poetry Club.

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